Wednesday, November 9, 2011

Sankalp

थकी नहीं मछुआरे की आखें,
ताकते समन्दर की गहराईयों को,
बैठता था वो हर रोज़ देखने,
तैरती मछलियों की सरमायिओं को...

समन्दर की स्थिरता में,
कुछ ऐसा खो जाता,
नौका में पड़ी मछली की चीखें,
भला सुन भी कैसे पाता...

मौत का सामना करते हुए,
मछली दिल खोल कर रोई,
नीले गगन को पुकार कर बोली-
"मेरा समन्दर वापस करदो कोई..."

ज़िन्दगी की तलब में,
रोई वो ढेर ऐसा,
बना दिया खुद का घर,
अश्कों का मत्स्याल्य हो जैसा...

हैरान मछुआरे को मछली के संकल्प में,
दिखी जैसे अपनी ही छवि,
कागज़ कलम उठाके वो,
बन गया एक रोचक कवि...


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